मेरे घूंघट का भी अपना ही गुमां है।
कल ही ताने देते कहा, क्या हुआ है?
क्यूँ तेरे गाल शुर्ख हुए,
जिसे मुझे छुपाना पड़ा है।
जिस उठते - गिरते पलको में,
हैं कोई राज छुपाया,
बोलो भला क्या मैंने न दबाया?
होता क्या गर मैं न होती,
जबाब क्या सबको दे पाती ?
ताने सुनती, फिर पछताती।
मेरे घूँघट का भी अपना ही गुमां है।
कभी, पड़ी ज़रूरत हमदर्दी की
तो मरहम इसी ने लगाया।
हुआ जो कभी दिल उदास ,
अपने ही मुराद से।
और ढलके लहू बन अश्रु की धार से,
उसका भी दर्द तो इसी ने छुपाया।
क्यूँ बनु असहाय पत्थरों के शहर में,
ये आईना भी इसी ने दिखाया।
कि जिसने मेरा मर्म न जाना,
फिर उसे क्यूँ अपने अश्रु दिखाना।
सहनशीलता भी तो इसी ने सिखाया।
क्या बुरा है जो,
मेरे घूँघट को गुमां हुआ है।

वाह ! घूँघट को क्या रूप दीया है
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