धुँधली परछाईं, कविता,poem, अभिव्यक्ति, यादे।

धुँधली परछाईं 



ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

धुँधली परछाईं।


 ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

हो न हो, बहार के कुछ तो फूल बचे होंगे,

लाख पतझड़ ने दस्तक़ दी हो 

या हिम ने कहर बरपाया हो।

वृक्ष न सही, जड़ें तो हरि होंगी।


ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

हाँ यही 10-12 घरों के एक मुहल्ला,

 उस मुहल्ले में पीपल, बरगद , अम्बिया की छइयां,

उस छइयां के नीचे, बचपन की अठखेलियाँ।

पीपल , बरगद तो काट दिए गए ,

उसकी जगह है उँची महलिया।


ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

उँची महलियो के है बंद दरवाज़े, बंद है खिड़की।

ना है शोर, ना ही अठखेलियाँ।

हर घर मे अनुभवी बच्चे, उन बच्चो के गजब खिलौने।

क्रिकेट, कबड्डी तो हुई कल की बाते,

आज तो पब जी हैं हर दिल पर छाते।


ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

काकी को देखा, उनकी आँखें धुँधली पुरानी सी लगती है।

थोड़ी पहचानी थोड़ी अनमनी सी लगती है।

हर घर मे चीज़ो की तरह वो भी पुरानी सी लगती है।

देखा था कभी हमने उनको सतरंगी साड़ी 

और बलखाती लंबी जुल्फों के संग में।

मुहल्ले के काकाओ के धरकते दिल मे।


ये ईश्क़ की गलियाँ, थोड़ी पहचानी सी लगती है।

हम भी गुज़रे हैं कभी उधर से, यादे, धुँधली परछाईं सी लगती है।

धुँधली परछाईं।

                                           ✍️Upeksha ❣️




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