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ये रात भी न!

ये रात भी न!


ये रात भी न, पलकों के चिलमन को उठा 

आंखों के बरामदे बैठ गई है ।

बोलती है नींदों की पहरेदारी करेगी।

शांत सन्नाटे में खोया ये जहाँ, और खोई मैं।

पर ये रात आंखों के बरामदे बैठ गई है,

कहती है मुझसे बाते करेगी।

चाँदनी आई नही, गुफ़्तगू इसकी हुई नही,

तो ये मुझे अपना हर दर्द बताएगी 

इसलिए मेरे आंखों के बरामदे, 

नींद की पहरेदारी करेगी।

बोली भी, जा झींगुर संग लाड लड़ा,

नही , ये तो मुझे ही हर मर्ज बताएगी।

कहती है, झींगुर झुंड में है,

 हर कोई किसी के संग में है। 

कहाँ मेरा मर्म समझ पाएगी वो, जो तू समझ पाएगी।

इसलिए मेरे आंखों के बरामदे, 

नींद की पहरेदारी करेगी।

जब रात ने ठान ली है, कहाँ मानेगी!

मैने भी अब हार मान ली है,

रात तू सुना ही डाल, 

हथियार मैने  भी अब डाल दी है। 

क्योंकि रात मेरे आंखों के बरामदे, 

नींद की पहरेदारी करेगी।


               ✍️Upeksha❣️



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