जटायु प्रसंग जन्म नही अच्छे कर्म सार्थक होते हैं।

 "जटायु प्रसंग" जन्म नही अच्छे कर्म सार्थक होते हैं।

"Jatayu prasang" janm nhi acche karm sarthak hote hain.

आज, जिसे कलयुग कहते हैं, सबसे उच्च कोटि की जाति में जन्म लेकर भी मनुष्य जाति-पाति के भेद-भाव जैसे ढकोसले में उलझा पड़ा है।नही समझना चाहता कि उँचा जन्म से नही, बल्कि कर्म से बना जाता है। तभि तो गिद्ध कूल में जन्मे जटायु के प्राण प्रभु श्री राम के गोद में जय श्री राम कहते हुए छूट था।जिनके प्रसंग आज भी प्रेरणादायक है।
जिसका अंश मात्र मैं आपलोगो के सामने रखना चाहती हूँ

"जटायु प्रसंग", हमारी संस्कृति

जटायु प्रसंग :
कहते हैं कि जन्म से कोई बड़ा नही होता, बड़े होते हैं उसके कर्म।
और ये कर्म सिर्फ मनुष्यों के लिए नही बल्कि हर उस जीव के लिए है, जिसने मृत्यु लोक में जन्म लिया।
ठीक उसी तरह , गिद्ध भी होते हैं, जिन्हें बड़े ही हेय दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि वो मेरे हुए जीवों को नोच-नोच कर खाते हैं।
लेकिन जब बात जटायु प्रसंग की आती है, तो कर्म ही सर्वोपरि है, स्पष्ट समझ आता है।
जटायु भले ही गिद्ध योनि मे पैदा हुए जो मृतको का भक्षण कर अपना पोषण करती है। देखने में भी विचित्र लगते हैं, किसी घर के ऊपर बैठ जाए तो उस घर को अशुभ माना जाता है।इन्हे Scavangers भी इसी लिये माना जाता है। गिद्ध का दर्शन तक भी शुभ नही माना जाता। लेकिन इसी योनि मे जन्म लेकर जटायु ने वो सौभाग्य प्राप्त किया जो बड़े - बड़े ऋषि मुनियों को भी अत्यन्त दुर्लभ हो सकता है। कहते हैं, कर्ण महान योद्धा, ज्ञानी और सूर्य पुत्र होकर भी द्रोपदी  चीड़ हरण में चुप होकर, अपने महानता को घटा लिया था और मनुष्य योनि में जन्में होकर भी सर्व विद्याओं में निपुण कर्ण द्रोपदी चीरहरण को देखा और अपने पूर्ण जीवन के  कर्म को कलंकित कर लिया था। लेकिन जटायु ने आखिरी सांस प्रभू की गोद मे लेने का सौभाग्य पाया, और ये सौभाग्य जटायु ने ऐसे ही नही पाया।इतना ही नही जटायु का अन्तिम संस्कार स्वयं प्रभू श्री राम ने अपने हाथों से किया और उन्हे सीधा मोक्ष प्रदान किया।

लेकिन यह पात्रता जटायु ने यूँ ही नहीं हासिल की थी। ना ही उन्हें महान ऋषियों के संगत का सौभाग्य प्राप्त था। फिर भी उन्होंने अपने पूण्य कर्मो के बल पर प्रभु श्री राम के गोद में अंतिम स्वांस छोड़ने का सौभाग्य प्राप्त किया। बहुत ही सुन्दर एक दोहा है जो जटायु प्रसंग में बड़ी ही खूबसूरती से चरितार्थ होती है। 
"परहित सरिस धरम नही भाई" । 
जटायु ने स्वयं को एक स्त्री की रक्षा हेतु बलिदान कर दिया था। वह जानता था की सीता जी को रावण से बचाने के प्रयास विफल होंना तय था  इसमें वह अपने प्राणों से भी हाथ धो सकता है, साथ ही वह वृद्ध भी हो चुका था। परन्तु उसने फिर भी प्रयास नही छोड़ा, और वही किया जो उचच कर्मों से फलीभूत हो,और एक प्राणी का कर्तव्य हो।
उसने अंतिम साहस तक प्रयास किया और रावण जैसे योद्धा से लड़ाई करने में जड़ा भी कोताही नही की। जिसके नाम से तीनों लोक कांपते थे, स्वयं विष्णु को भी मानव अवतार लेना पड़ा था और उससे लड़ने के लिए, या फिर कहिए कि एक स्त्री की रक्षा से जुड़े उच्च कर्मो के लिए मृत्यु को भी गले लगाने में हिचकिचाहट नही दिखाई।

भीषण रूप से घायल जटायु दर्द से छटपटाते रहे, लेकिन प्राण तभी छोड़े जब सीता जी के अपहरण का वाक्या उन्हें सुना नही दिया।
 जटायु जी राम जी के आगमन तक अपने प्राणों को रोके रखा। उन्हे सीताजी के रावण द्वारा अपहरण की सूचना को देने के बाद अन्तिम शब्द जो मुँह से निकला वह भी प्रभू श्री राम का नाम ही था। जटायु राम काज मे प्राणों को उत्सर्ग करने वाला संभवत: पहला बलिदानी था। 
 "जात पात पूछे नही कोई , हरि को भजे सो हरि का होई"।

यह पंक्तियां जटायु के जीवन पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। ऐसे प्रभू भक्त और भक्त वत्सल भगवान को हमारा कोटि कोटि नमन है, जिनसे हमें मनुष्य कूल में जन्म लेकर भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।🙏🙏
उम्मीद है, आप सबको ये जटायु प्रसंग पसंद आएगी।समय समय पर मैं इसमे कुछ और कड़ियाँ जोड़ने की कोशिश करूँगी।

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                                            ✍️Aparichita🚩

Shikha Bhardwaj

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