तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो। |
| तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो। |
तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो।
अमावस्या की जुगनुओं को पकड़ने चले हो?
तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो।
क्यूँ नही संभलते....?
ये इश्कियां जुगनू ......
पूनम की रात को खो जाया करते हैं..
मुहब्बत बस..छलावा है..
शुकुनों चैन को गिरवीं रखने चले हो।
फाल्गुनी ख़ुशबू...
पतझड़ में कहाँ मिला करती है..
ये नए जमाने का ईश्क़ है...
मौशमों के रंग देखकर बदलते रहते हैं।
मुबब्बतों के साये में तो .......
आशिकों के वक़्त थमा करते हैं....
पर शाम...अपने ही रफ़्तार से गुजरती है।
भँवरों को देखा है.....?
सूखे फूलों पर मँडराते हुए!
उन्हें भी फूलों की ताज़गी से ही मुहब्बत है।
अमावस्या की जुगनुओं को पकड़ने चले हो?
तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो।
कभी तो कर लो....ख़ुद की भी कद्र
दूसरे की फिक्र में अपना सब भुलाने चले हो।
तुम फ़िर मुहब्बत करने चले हो।
✍️Shikha Bhardwaj❣️