Yaadein,यादें

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 यादें! ये यादे ही तो हैं..
जो वक़्त-वेवक्त,
 इस सुनसान खंडहर से दिल में..
कुछ खट्टे - कुछ मीठे,
खुशियों के दीप जलाती है।

कभी कुरेदती हर उस ज़ख्म को...
जिसपर वक़्त अपना मरहम लगाने की, 
हर जद्दोजहद में लगी है।
पर हल्की सी एक झोंका यादों की,
वक़्त की रेत बहा ले जाती है।

क्या देखते हो ?
तो सुनो! 
मेरे ख़ाक में भी तुम्हारी ही ख़ुशबू मिलेंगी।
जो बताएंगी तुम्हे..
कि रिज़्म में, ईश्क़ में, रक़ीब हो या नसीब..
हर जगह...हर रिस्ते में घुले.. बस तुम हो।
कि जहन में कहाँ तक बचे हो ?

यादें! ये तुम्हारी यादें ही तो हैं...
आज भी मेरी वैशाखी बनी है..।

जो उबर-खाबड़, धुन्ध से घिरे...
ज़िन्दगी के रास्तों का एकमात्र विकल्प है।
उन्हीं यादों को गाँठ बांध ख़ाक हो जाऊँ।

तुमसे बंधी थी जो उम्मीद...
तुम न सही , तुम्हारी यादों से ही सही।
तुम्हारी यादें ही सही...दोगे न  साथ....!?




                   
                  Aparichita_अपरिचिता ___✍️

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