बचपन_bachpan

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बचपन_bachpan



 एक नज़र यूँ मुड़कर देखा,

पास ही खड़ी, बचपन मेरी,

मुस्कुरा रही थी।

कैसी हो? जैसे चिढ़ा रही थी।

बड़ी जल्दी थी, बड़ी होने की!

क्या सीखा शबब यूँ मुझसे भागकर,

बताओ जवानी कैसे बीत रही थी?

बचपन_bachpan


एक नज़र यूँ मुड़कर देखा,

पास ही खड़ी, बचपन मेरी,

मुस्कुरा रही थी।

क्या कहूँ की बचपन तुम भली थी,

जवानी बस रुला रही थी।

होगी सावन हरी  किसी की,

मेरे लिए तो बस आँसुओं की झड़ी थी।

झूठे वादे झूठे लोग,

 जिंदगी को बस फांसे खड़ी थी।

माना आज नही, कल तो कुछ अच्छा होगा

सोच सोच कर ज़िन्दगी गुज़र रही थी।

वो भी न देखा गया कुदरत को,

जो भी था, देखो आज सब शून्य पड़ा है,

कल को क्या होगा, 

अब सोचना भी भारी पड़ा है।

बचपन_bachpan



एक नज़र यूँ मुड़कर देखा,

पास ही खड़ी, बचपन मेरी,

मुस्कुरा रही थी।

कुछ कोड़े कागज़ हैं, वक्त के पैवंद हैं।

जो कुछ कहती सुन लेती है,

मैं भी दिल के अरमां वहीं पर लिख देती,

देखूँ और क्या बाक़ी बचा है जीवन मे

सहना पड़ेगा, तो सह ही लुंगी,

लेकिन आश कहाँ छोडूंगी,

कोई तो हारेगा एकदिन,

ज़िन्दगी और रुलाएगी 

या फिर साँस यही थम जाएगी।

बचपन_bachpan



एक नज़र यूँ मुड़कर देखा,

पास ही खड़ी, बचपन मेरी,

मुस्कुरा रही थी।


#बचपन_bachpan


✍️Shikha Bhardwaj


Shikha Bhardwaj

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